सावनको उर्लदो भेल भो जवानी


गजल
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सावनको उर्लदो भेल भो जवानी  
यात्रामा छुटेको रेल भो जवानी //1//

 
समाजको बन्धन सारै नै कडा
आफैलाई आज जेल भो जवानी //2//

कागलाई जस्तै मलाई नि उस्तै
रुखमा पाकेको बेल भो जवानी //3//

न जीत मेरो भो न हार भो मेरो
डन्डी र बियोको खेल भो जवानी //4//

भएन हिम्मत नाघ्न सिमा रेखा
न दिई परीक्षा फेल भो जवानी //5//

copyright @ मोहन बिहानी
भक्तिपुर सात
सर्लाही
२०७०-०४-७ गते सोमबार

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